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उत्‍तराखंड में कड़वी हुई रिश्तों की भाषा, तो डीएम ने समझाई परिवार की परिभाषा; बेटे-बहू और पोती को दिलाया हक

देहरादून। राजधानी दून की चकाचौंध में रिश्तों का अक्स धुंधला पड़ता जा रहा है। यहां रिश्तों की डोर ‘मैं’ और ‘मेरे’ के आगे कमजोर पड़ती जा रही है। कहीं बेटा और बहू मिलकर माता-पिता को बेदखल करने पर आमादा हैं तो अब दुर्लभ से दुर्लभतम श्रेणी वाला एक ऐसा प्रकरण भी सामने आया है, जहां माता-पिता ही बेटे-बहू और 04 साल की अबोध पोती को बेदखल करने पर तुले हैं।नकरौंदा सैनिक कालोनी (बालावाला) निवासी जुगल किशोर वर्मा और उनकी पत्नी संगीता वर्मा ने भरण पोषण अधिनियम के तहत बेटा और बहू को घर से निकालने का वाद दायर कर दिया। हालांकि, जिलाधिकारी सविन बंसल ने रिश्तों की इस कड़वी भाषा का मजमून भांपा और परिवार की परिभाषा समझाते हुए माता-पिता का वाद खारिज कर दिया।जिलाधिकारी सविन बंसल ने जुगल किशोर वर्मा और उनकी पत्नी संगीता वर्मा की ओर से दायर याचिका के सभी पहलुओं पर गौर किया। उन्होंने पाया कि जुगल किशोर राजपत्रित पद से रिटायर हैं और उनकी पत्नी अभी वेतनभोगी हैं। दोनों की मासिक आय 55 हजार रुपये है।

वहीं, उनके बेटे अमन और बहू मीनाक्षी की कुल मासिक आय महज 25 हजार रुपये है। उनकी 04 वर्षीय बेटी भी है। इसके साथ ही माता-पिता की अपील में किसी तरह के भरण पोषण की मांग नहीं की गई है। वह सिर्फ बेटे, बहू और उनकी बेटी को घर से बेदखल करना चाहते हैं।

जिलाधिकारी ने दोनों पक्षों के सुनने के बाद पाया कि यदि अल्प वेतनभोगी बेटे और उसके परिवार को घर से निकाला जाता है तो 04 साल की अबोध बच्ची के भविष्य पर गहरा असर पड़ सकता है। यह किसी भी परिवार की परिभाषा के विपरीत है। उन्होंने स्पष्ट किया कि निजी स्वार्थ के लिए बेटे और उसके परिवार को बेदखल करना न्याय हित में सही नहीं है।

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