बंद हो रहा दून का ‘गड्ढे वाला’ सिनेमाहॉल, इंटरनेट की दुनिया,ओटीटी ने बदली मनोरंजन की दुनिया

देहरादून का प्रसिद्ध ‘गड्ढे वाला’ सिनेमाहॉल अब बंद हो रहा है। इंटरनेट और ओटीटी प्लेटफॉर्म के बढ़ते चलन ने दर्शकों को घर बैठे मनोरंजन उपलब्ध करा दिया है, जिससे सिनेमा हॉल की लोकप्रियता घट गई। दशकों से यह हॉल लोगों के मनोरंजन का केंद्र था, लेकिन अब इसे बंद करने का निर्णय लिया गया है।इंटरनेट की जगमगाती दुनिया, ओटीटी प्लेटफार्म का बढ़ता क्रेज। इस बदलते दौर ने सिंगल स्क्रीन सिनेमाघरों की तस्वीर व तकदीर दोनों को भी बदल डाला। देहरादून की बात करें बीते एक दशक से कई सिंगल स्क्रीन सिनेमाघर बंद हो चुके हैं जबकि कई यादों में सिमटककर रह गए। 14 से 15 सिनेमाघरों में अब मात्र चार ही सिनेमाघर संचालित हो रहे हैं।
इनमें से गड्ढ़े वाला सिनेमा के नाम से प्रसिद्ध सबसे बड़ा पर्दा वाला छायादीप सिनेमा भी अपने पांच दशक पूरा करने के बाद अब लगभग बंद हो चुका है। कमाई न होने से संचालक इसे बेच रहे हैं। जनवरी से अबतक यहां एक ही फिल्म चल रही है। जब कभी 15 लोग फिल्म देखने के लिए यहां एकत्रित हो जाते हैं तो फिल्म चलाई जाती है अथवा यूं ही बंद पड़ा हुआ है।देहरादून की बात करें तो सिनेमा का इस शहर से गहरा नाता रहा है। 80 के दशक में जब कोई फिल्म प्रदर्शित होती थी तो सड़कों पर कई दिनों तक मेला जैसा नजारा रहता था। एक ही फिल्म कई हफ्ते तक देखी जाती थी। लेकिन बदलते दौर के साथ सिनेमाघर अब यादों में ही रह गए हैं। जानकारों के मुताबिक 80 के दौर में देहरादून में तकरीबन 14 से 15 सिनेमाघर थे, लेकिन वर्तमान में चार ही सिनेमाघर संचालित हो रहे हैं।
इसके पीछे का कारण मल्टीप्लेक्स, ओटीटी प्लेटफार्म बताया जा रहा है। यूं तो दून में किसी ना किसी वर्ष सिनेमाघरों का सफर खत्म होता है। लेकिन गांधी पार्क के सामने संकरी सी गली से होते हुए ढलान के पस स्थित छायादीप सिनेमा 1974 बनाया गया था। यहां पहली फिल्म 19 जलाई 1976 में महबूबा रिलीज हुई थी। उन दिनों 30 पैसा का आगे जबकि एक रुपये 90 पैसे का बालकनी का टिकट होता था।
सिनेमाहाल के स्वामी अजमत सिराज खान और कामिल सिराज खान ने बताया कि उनके पिता एस खान ने दो बीघा में बने इस सिनेमाहाल को वर्ष 2000 में करतार सिंह अरो़ड़ा और सुभाष गुप्ता जो इसके पार्टनर थे, उनसे खरीद लिया था। यहां लैला मजनू, महबूबा, निकाह, उमरावजान आदि कई फिल्में दिखाई गई। बाद में यहां भोजपुरी फिल्में अधिक चलने लगी।
कोरोनाकाल के बाद से सिनेमाहाल में दर्शकों की संख्या बेहद कम होने लगी। पहले जहां यहां 14 लोगों का स्टाफ होता था अब दो लोग हैं। जो मजदूर वर्ग के लोग यहां फिल्म देखने आते थे वह भी जब समय मिलता है माल आदि में देख लेते हैं अथवा ओटीटी पर देखते हैं। इसलिए यहां अब गिनती के 10 से 15 लोग पहुंचते हैं।




